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How to register under Live-in Relationship Act, who will be considered live-in partners and how will they get the rights? | EduCare न्यूज: लिव-इन रिलेशनशिप एक्ट का ऐसे करें रजिस्ट्रेशन, किसको माना जाएगा लिव-इन पार्टनर्स और कैसे मिलेंगे अधिकार

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1 घंटे पहलेलेखक: सृष्टि तिवारी

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उत्तराखंड विधानसभा में 6 फरवरी को यूनिफॉर्म सिविल कोड (UCC) बिल पेश किया गया है। इस बिल में लिव-इन रिलेशन एक्‍ट 381 का प्रस्‍ताव रखा गया है। इसके अनुसार, अब उत्तराखंड राज्य में लिव-इन में रहने वाले सभी युवाओं को रजिस्ट्रेशन कराना जरूरी होगा।

इसके साथ ही यदि किसी अन्य राज्य के युवा उत्तराखंड राज्य में जाकर लिव-इन में रहना चाहते हैं, तो उन्हें भी रजिस्ट्रेशन करवाना जरूरी होगा। यदि अनिवार्य रजिस्ट्रेशन नहीं करवाया जाता है, तो लिव-इन में रह रहे युवाओं को 6 साल तक कि सजा और 25 हजार तक का जुर्माना भरना होगा।

युवाओं को इस बिल से क्‍या फायदा होगा और इससे जुड़े क्‍या नियम जानने जरूरी हैं, ये हमें बता रहें सुप्रीम कोर्ट के वकील विराग गुप्‍ता।

रजिस्‍ट्रार के सामने देना होगा स्‍टेटमेंट

उत्तराखंड में रह रहे किसी भी राज्य के युवाओं को लिव-इन में रहने के लिए एक्ट 381 के सब-सेक्शन (1) के अंतर्गत रजिस्ट्रार के सामने स्टेटमेंट देना जरूरी होगा।

इसके साथ ही यदि उत्तराखंड राज्य का कोई कोई युवा राज्य के बाहर लिव-इन में रहता है, तो उसे उस राज्य में रजिस्ट्रार के सामने इसका स्टेटमेंट प्रस्तुत करना जरूरी होगा।

सवाल: लिव-इन का क्राइटेरिया कैसे तय होगा, इसमें कौन से लोग आएंगे?

जवाब: लिव-इन एक सामाजिक शब्द है जिसकी कानून के तहत स्पष्ट व्याख्या नहीं की गई है। कानून के अनुसार, लड़की के लिए 18 साल और लड़कों की शादी की न्यूनतम उम्र 21 वर्ष है। तय उम्र के ऐसे युवा जो बिना शादी के एक साथ रहते हैं तो इसे लिव-इन रिलेशन माना जाता है।

लिव-इन में जन्मे बच्‍चों को मिलेंगे कानूनी अधिकार

यदि लिव-इन पार्टनर्स बच्चे को जन्म देते हैं, तब उस बच्चे को वैध संतान माना जाएगा, उसे एक लीगल बच्चे के सभी अधिकार दिए जाएंगे।

रजिस्ट्रेशन नहीं करवा सकेंगे ये लोग

ऐसे दो लोग जो लिव-इन रिलेशनशिप के आर्टिकल 3 के सब-सेक्शन 1 के क्‍लॉज(d) के अंदर आते हैं, वो लिव-इन पार्टनर के तौर पर रजिस्ट्रेशन नहीं करवा सकते हैं। यानी-

  • ये नियम उन लोगों पर लागू नहीं होगा जिनकी जाति या प्रथा में शादी करने की अनुमति नहीं हों।
  • जहां दोनों में से कम से कम कोई एक शादीशुदा हो।
  • जहां दोनों में से कोई एक व्यक्ति माइनर हो।
  • जहां दोनों में से किसी एक लिव-इन पार्टनर के साथ जोर जबरदस्ती की जा रही हो, दूसरे पार्टनर ने झूठ बोलकर, धोखा देकर साथ रहने को मजबूर कर रहा हो।

सवाल: क्या लिव-इन में कोई कोई कानूनी दांव फंस सकता है?

जवाब: बगैर किसी दबाव के पार्टनर्स का लिव-इन में रहना भी जरुरी है। इसके लिए स्वेच्छा और सहमति का भी क्राइटेरिया होगा। लड़के और लड़की की पहले शादी नहीं हुई हो, इस बात को भी समझने की जरुरत पड़ेगी। हालांकि, उत्तराखंड के बाहर अगर कोई व्यक्ति लिव-इन में रहने के बाद राज्य में दूसरी शादी कर ले तो फिर उसमें कानूनी पेंच फंस सकता है।

सवाल: रजिस्ट्रार, लिव-इन रिलेशनशिप की कानूनी वैधता कैसे निर्धारित करेंगे?

जवाब: संविधान और सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार वयस्क लोगों को सहमति से रिश्ते रखने का अधिकार है। हालांकि, उत्तराखंड के अलावा किसी अन्य राज्य में लिव-इन के रजिस्ट्रेशन के बारे में कोई कानून नहीं है। उत्‍तराखंड सरकार विस्‍तार से इसके नियमों को नोटिफाई करेगी।

रजिस्ट्रेशन का उद्देश्य रिकॉर्ड रखना

आर्टिकल 381 के सब-सेक्शन (4) के क्‍लॉज (a) में ये बताया गया है कि लिव-इन का रजिस्ट्रेशन करवाने का उद्देश्य बिना शादी साथ रह रहे युवाओं का रिकॉर्ड रखना है।

रजिस्ट्रार टर्मिनेट करेंगे लिव-इन रिलेशनशिप

रजिस्‍टर्ड लिव-इन पार्टनर्स को रिलेशन खत्‍म करने के लिए भी रजिस्‍ट्रार से अनुमति लेनी होगी।लिव-इन पार्टनर्स के आवेदन की जांच करना, उनके रिकॉर्ड अपने पास रखना और उनके लिव-इन रिलेशनशिप को खत्म करना भी रजिस्ट्रार के अधिकार में होगा।

सवाल: क्या इसमें पैरेंट्स या फैमली का कोई इन्वॉल्वमेंट रहेगा?

जवाब-धर्मान्तरण के मामलों में उत्तर प्रदेश के कानून के अनुसार शादी के रजिस्ट्रेशन के पहले पब्लिक नोटिस जारी करने की प्रक्रिया है। हालांकि अभी लिव-इन को लेकर ऐसा कुछ भी नहीं बताया गया है। ऐसे मामलों में स्पष्टता के लिए कानून के अनुसार सरकार विस्तार से नियमों को नोटिफाई कर सकती है।

भास्कर एक्सपर्ट: विराग गुप्ता, सुप्रीम कोर्ट के वकील।

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