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Maid beats child, son becomes mute | बच्चे को कामवाली पीटती, बेटा हुआ गूंगा: बच्चों के लिए नौकरी छोड़ी; रात को आइडिया आया, सुबह पराठे बेचने शुरू किए

नई दिल्ली22 मिनट पहलेलेखक: संजय सिन्हा

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मैं शाइस्ता कौसरी ग्रेटर नोएडा में ‘शाइस्ता किचन’ चलाती हूं। ऐसा रेस्तरां जो घर जैसा खाना देता और परोसता है। करीब 6 साल पहले फूड इंडस्ट्री में आई लेकिन इसके पहले दूर-दूर तक कुकिंग से कोई नाता नहीं था।

किचन में घंटों काम करना, परिवार के लिए खाना बनाना अलग बात है लेकिन इससे पैसे कमाऊंगी, कभी सपने में भी नहीं सोचा था।

मैं और मेरे पति आइटी सेक्टर में थे। माइक्रोसॉफ्ट, डेल, आइबीएम जैसी कई मशहूर मल्टीनेशनल कंपनियों में काम किया। महीने की सैलरी डेढ़ लाख थी। लाइफ पूरी तरह आराम और मजे से गुजर रही थी। जरूरत की सभी सुख सुविधाएं थीं।

केयरटेकर की पिटाई से बेटा सहमा, बोलना बंद किया

मेरे दो बच्चे हुए। बच्चे जब छोटे थे तब घर पर मेड के भरोसे बच्चे को छोड़ नौकरी पर चली जाती।

हम तब दिल्ली के उत्तम नगर में रहते थे। मेरा बेटा दिनभर नौकरानी के पास रहता। इस दौरान वह बेटे को खूब टॉर्चर करती। उसे पीटती। हमें लंबे समय तक इसका पता नहीं चला। उस पिटाई की वजह से मेरे बेटे ने बोलना बंद कर दिया।

वह हमेशा चुप और सहमा रहता। हमें पता ही नहीं चला और मेरा बेटा गूंगा हो गया। पेरेंट्स के रूप में हमारे लिए यह सदमा था।

तब मैंने बच्चों की देखभाल के लिए नौकरी छोड़ दी। कुछ समय बाद हम कोलकाता शिफ्ट कर गए जहां हमारे परिवार के बाकी सदस्य थे। दो साल कोलकाता में रहने के बाद हम वापस दिल्ली आ गए।

परिवार के साथ शाइस्ता कौसरी।

परिवार के साथ शाइस्ता कौसरी।

डेढ़ लाख की नौकरी छोड़ 20-25,000 महीने वाली नौकरी भी की

मैंने आईटी का जॉब छोड़ दिया। बच्चे भी बड़े हो रहे थे। तब मैंने करियर में फिर वापसी की कोशिश शुरू की। सैमसंग, लॉ फर्म जैसी कंपनियों में अप्लाई किया। कई जगहों पर नाइट शिफ्ट थी लेकिन मैं ऐसा जॉब नहीं कर सकती थी।

एक कोचिंग इंस्टीट्यूट में एडमिन में भी 20-25,000 की सैलरी पर काम किया।

मैं नौकरी इसलिए नहीं कर रही थी कि पैसे की जरूरत थी। पति नौकरी में थे, कोई आर्थिक तंगी नहीं थी।

लेकिन मुझे हमेशा लगता है कि घर पर रहूं और फाइनेंशियली कुछ न करूं तो ठीक नहीं है। मुझे माइग्रेन शुरू हो जाता है। बच्चों की देखभाल, परिवार संभालना जरूरी है लेकिन पर्सनल ग्रोथ भी उतनी ही जरूरी है।

रात में पराठे बनाने का आइडिया आया और सुबह से बेचना शुरू कर दिया

कोलकाता से नोएडा आने के बाद दोबारा से कई जगहों पर काम किया। लेकिन नौकरी मेरे मन मुताबिक नहीं थी।

तब मेरा घर में ज्यादा समय किचन में बीतता। बच्चों को भी खाने के टेस्ट बड्स बन रहे थे, पति भी खाने के शौकीन हैं। तब मैंने पति से पूछा कि क्या किचन से कुछ कमा सकते हैं? तब बातों ही बातों में पराठे बनाने का आइडिया आया।

रात में आइडिया आया और सुबह इस पर काम शुरू हो गया।

दो-तीन दिनों तक पति ने आटा गूंथने, सब्जी काटने आदि में मदद की। फिर हमने सोसाइटी के वाट्सएप ग्रुप पर डाला कि हम पराठे बेच रहे हैं।

2 दिन बाद ही डिलीवरी ब्वॉय रखा और टिफिन सर्विस चल निकली

पराठे बनाने के दो दिन बाद ही इतने ऑर्डर आने लगे कि हमें डिलीवरी ब्वॉय रखना पड़ा। जब लोगों को खाने का टेस्ट घर जैसा लगा उन्होंने फोन कर कहा कि क्या वह टिफिन सर्विस दे सकती हैं यानी पूरे खाने का इंतजाम कर सकती हैं।

ग्रेटर नोएडा के चार मूर्ति इलाके में कोई बड़ा रेस्तरां या टिफिन सर्विस नहीं थी। इसका लाभ मुझे मिला। मैं घर में चावल, रोटी, एक नॉनवेज, एक वेज और दाल बनाती। यही खाना पैक कर ग्राहकों को भेजा जाता।

मैं कस्टमर को यही कहती कि मैं आपके टेबल पर वही खाना सर्व करूंगी जो अपने बच्चों को खिलाती हूं। हेल्दी और न्यूट्रिशियस।

करीम, नरूला की तरह शाइस्ता का नाम भी होगा मशहूर

‘शाइस्ता किचन’ नाम देने का आइडिया मेरे पति का रहा। वो कहते हैं कि करीम, नजीर, नरूला ने अपना नाम बनाया। वैसे ही शाइस्ता का भी नाम फूड इंडस्ट्री में रोशन होगा।

पहले तो घर से ही खाना तैयार होता। लेकिन पति ने इस बात पर जोर दिया कि अब इसे कमर्शियल लेवल पर शुरु करना है।

हमने बिना किसी लोन या बिना किसी फंड रेज के गौड़ सिटी के सेवेंथ एवेन्यू मार्केट में शाइस्ताज किचन खोला। मार्केट में खुद को बनाए रखना काफी चुनातीपूर्ण रहा। तब मैंने अपनी ज्वेलरी तक बेच दी।

प्रोफेशनल शेफ की मदद से मेनू डिजाइन किया, रेसिपी को लेकर एक्सपेरिमेंट किए, मार्केट स्टैंडर्ड बनाए रखने के लिए सर्वे किया।

इस तरह हमारा बिजनेस चल निकला। अभी शाइस्ता किचन में 11 कर्मचारी हैं। हमें इस बात से खुशी होती है कि आज मैं इतने लोगों को रोजगार दे पा रही हूं।

साथ ही इवेंट मैनेजमेंट का भी काम शुरु किया। हमने ‘शुभ मंगल मुबारक’ की शुरुआत की। इसके तहत हम मैरिज, बर्थडे फंक्शन की पार्टीज होस्ट करते हैं। इसमें कई वेंडर्स के साथ टाइअप है। एक साल में 40-45 ऐसे बड़े इवेंट कर लेती हूं।

स्लम बस्ती में झोला बनाती महिलाएं।

स्लम बस्ती में झोला बनाती महिलाएं।

‘झोलामेकर’ की शुरुआत, स्लम बस्तियों में बनाती झोला

कहते हैं बचपन की छाप जीवन पर हमेशा पड़ती है। मैंने अपने पापा को देखा था कि वो किसी चीज को जल्दी फेंकते नहीं थे। अगर पैंट पुराना हो गई तो उससे जिप निकालते, बटन निकालते और उसे संभाल कर रखते। वो हिंदी ट्रेनिंग इंस्टीट्यूट में ऑफिसर थे।

लेकिन ड्यूटी से आने के बाद वो पुराने कपड़ों से स्कूल बैग बनाते।

नोएडा में जब मैं ‘रॉबिनहुड आर्मी’ संस्था से जुड़ी तो पता चला कि कैसे पुराने कपड़े बेकार फेंक दिए जाते हैं। गुरुग्राम में एक इवेंट में मैंने देखा कि कैसे टेक्सटाइल कंपनियों के मिसप्रिंट कपड़ों से बैग्स तैयार कर बेचे जा रहे हैं।

तब मुझे पुराने कपड़ों से थैला बनाने का आइडिया आया। बंगाल, ओड़िशा में थैला नहीं, झोला कहते हैं।

इस तरह हमने ‘झोलामेकर’ की शुरुआत की।

पुरानी साड़ी, चादर, पर्दे जमा करती, महिलाएं इससे झोला बनातीं

मैं जिस इलाके में रहती वहां आसपास में कंस्ट्रक्शन का काम अधिक होता। वहां काम करने वाले मजदूर पास में ही स्लम बस्तियों में रहते।

मैं स्लम बस्ती सरस्वतीपुरम गई और महिलाओं को समझाया कि उन्हें अपने पैरों पर खड़ा होना क्यों जरूरी है। दो पैसे खुद से कमाएंगी तो अपनी जेब खर्च के लिए पति से पैसे मांगने की जरूरत नहीं पड़ेगी।

मेरी बातों से प्रभावित होकर 10-12 महिलाएं मुझसे जुड़ीं। हम सोसाइटी से पुरानी चादरें, साड़ी और पर्दे जमा करते।

कुछ महिलाओं के पास पहसे से सिलाई मशीन थी, कुछ को हमने दिलाई। इस तरह स्लम की महिलाओं ने झोला बनाना शुरू किया।

जैसे हमने वाट्सएप से पराठे बेचने की शुरुआत की थी, वैसे ही झोला बेचने के लिए काम शुरू किया। कई कार्यक्रमों में स्टॉल लगवाए।

कुछ कंपनियों ने झोलामेकर को स्पांसर भी किया। बैग्स बनाकर कई लड़कियां आज अपने पैरों पर खड़ी हैं।

दादी मेरी रोल मॉडल, उनसे सीखे बिजनेस के गुर

मैं मूल रूप से ओड़िशा की रहने वाली हूं। बेहरामपुर में जन्म हुआ और पूरी पढ़ाई कटक से हुई।

मां स्कूल में टीचर रहीं जबकि पिता सरकारी अफसर रहे। जॉइंट फैमिली में पले बढ़े।

मेरे दादा की बीड़ी की फैक्टरी थी। फैक्ट्री में आग लग गई तो घर की स्थिति खराब हो गई। तब मेरी दादी ने घर के लिए काफी कुछ किया।

वह रसोई का सारा इंतजाम तो देखती ही थीं साथ ही छोटे बिजनेस भी करती।

गुड़ को पिघला कर उसकी टॉफियां बनातीं और बेचतीं। उन्हें पैसों की कमी नहीं थीं लेकिन कहतीं कि मैं आत्मसम्मान बचाए रखने के लिए काम कर रही हूं। दादी की इन बातों ने मुझ पर गहरा असर छोड़ा।

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