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Namrata Luhar did her graduation and PhD studies just in Rs 35, assistant professor in Baroda | 35 रुपए में ग्रेजुएशन, पीएचडी की पढ़ाई: टॉप किया, 6 गोल्ड मेडल मिले, शादी की, नहीं चली; अकेली पैरों पर खड़ी हूं

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नई दिल्ली5 दिन पहलेलेखक: संजय सिन्हा

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मैं नम्रता लुहार, गुजरात के बड़ौदा की रहने वाली हूं। बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव यूनिवर्सिटी में लॉ फैकल्टी में असिस्टेंट प्रोफेसर हूं।

इसी यूनिवर्सिटी में मैंने कानून की पढ़ाई की और पिछले 17 सालों से यहीं पढ़ा भी रही हूं। बचपन में कभी ‘साइलेंट गर्ल’ के नाम से जानी जाती थी।

ऐसी लड़की जो सकुचाई सी बहस से दूर रहती और बहुत कम बोलती है, साथ ही पढ़ने-लिखने में साधारण है। हर किसी के जीवन टर्निंग पॉइंट आता है, मेरे जीवन में भी आया।

कम बोलने वाली लड़की यूनिवर्सिटी की असिस्टेंट प्रोफेसर बन गई।

दैनिक भास्कर के ‘ये मैं हूं’ में आज जानिए मैं इस मुकाम तक कैसे पहुंची।

गुमसुम रहने वाली लड़की वकालत कैसे करेगी

बचपन में मैं बहुत शर्मीली हुआ करती थी। शांत रहती। स्कूल में भी टीचर्स ‘साइलेंट गर्ल’ कहतीं। मुझे देखकर कोई नहीं कह सकता कि ये लड़की कभी वकालत करेगी।

आठवीं कक्षा तक तो पढ़ाई करने के लिए बहुत मेहनत की। मैथ्स समझ में नहीं आता था। अंग्रेजी भी ठीक नहीं थी। लेकिन 9वीं कक्षा से मुझमें बदलाव आना शुरू हुआ। हमारे पड़ोस में शमीम हुसैन रहते थे जो एयरफोर्स में थे। ड्यूटी के बाद वो शाम में मुझे पढ़ाते थे।

उनके पढ़ाने के तरीके से मेरी पढ़ाई में काफी सुधार आया। 8वीं में जहां मुश्किल से 50% मार्क्स मिल पाते, 9वीं में परसेंटेज सुधर गई। क्लास में टॉप करने लगी और इस तरह मेरा आत्मविश्वास बढ़ता चला गया।

मैं 4 बहनों में सबसे छोटी हूं। कहीं अटकती तो बहनें मदद करतीं। स्कूल में भी दूसरी स्टूडेंट्स के साथ डिस्कशन करती।

इस दौरान ही मेरे मन में ख्याल आया कि मुझे कानून की पढ़ाई करनी चाहिए।

यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के बाद बचे समय में नम्रता सामाजिक कार्य भी करती हैं।

यूनिवर्सिटी में पढ़ाने के बाद बचे समय में नम्रता सामाजिक कार्य भी करती हैं।

​​​​​​बीकॉम से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई महज 35 रुपए में पूरी हुई

मैंने बीकॉम में एडमिशन लिया। जब सेकेंड ईयर में थी तो उम्र 18-19 साल की थी। तब एक डे स्कूल में टीचर की के रूप में पढ़ाना शुरू किया। स्टूडेंट्स के साथ कम्यूनिकेशन बढ़ने से मैंने बोलना सीखा।

मैं टीचिंग में ही करियर बना सकती हूं, यह मुझे समझ में आने लगा था। इस दौरान ट्यूशन भी पढ़ाने लगी।

घर की परिस्थिति ऐसी नहीं थी कि बहुत बड़ी यूनिवर्सिटी में पढ़ सकूं। महाराज सयाजी राव यूनिवर्सिटी में लड़कियों की एजुकेशन फ्री है।

मैंने बीकॉम से लेकर पीएचडी तक की पढ़ाई 35 रुपए में की है। आज भी यूनिवर्सिटी में लड़कियों की पढ़ाई पर बहुत कम खर्च होता है। लड़कियों को यूनिवर्सिटी में कई तरह की स्कॉलरशिप मिल जाती है।

कानून में रुचि के कारण एलएलबी किया, गोल्ड मेडलिस्ट रही

कानून में मेरी रुचि थी। 2002 में एलएलबी और 2004 में बिजनेस लॉ में एलएलएम पूरा किया। दोनों ही परीक्षाओं में बड़ोदरा में टॉपर रही, 6 गोल्ड मेडल मिले।

महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी से ‘ लॉज रिलेटेड टू राइट टू हेल्थ’ विषय पर पीएचडी पूरा किया।

नौकरी में आने के बाद मेहनत और बढ़ गई। मुझे इसी यूनिवर्सिटी में लॉ फैकल्टी में ‘बड़ौदा स्कूल ऑफ लीगल स्टडीज’ का असिस्टेंट डायरेक्टर बनाया गया। यूनिवर्सिटी के कॉरपोरेट अफेयर्स में को-ऑर्डिनेटर भी रही।

नेट का रिजल्ट आया, अगले दिन से क्लास लेना शुरू कर दिया

एलएलएम 2004 में किया। जब एलएलएम की फाइनल ईयर में थी तब मैंने ‘नेट’ क्लियर किया था। मैंने जानती थी कि मुझे एकेडेमिक्स में ही जाना है।

ये वौ दौर था जब देश में लॉ के टीचर्स बहुत कम थे। नेट का रिजल्ट शाम में आया और उसी समय बड़ौदा की महाराजा सयाजी राव यूनिवर्सिटी के डीन सैय्यद मकसूद ने कहा कि कल 8 बजे कॉमर्स फैकल्टी में तुम्हें बिजनेस लॉ की क्लास लेनी है।

मैं खुशनसीब थी इतनी जल्दी अवसर मिल गया, रिजल्ट आने के दूसरे दिन से ही पढ़ाना शुरू कर दिया।

पूरी रात सो नहीं पाई क्योंकि पढ़ाने के लिए तैयारी करनी थी। सालभर तक पढ़ाने के दौरान टीचिंग की बारिकियां सीखती रही। अपनी कमियां दूर करती। जैसे-जैसे समय निकलता गया, अपना बेस्ट देने की कोशिश करती रही।

परिवार के सदस्यों के साथ नम्रता।

परिवार के सदस्यों के साथ नम्रता।

वकालत के पेशे में पुरुषों का दबदबा कम हो रहा

लॉ फील्ड में पिछले 15-20 वर्षों में काफी बदलाव आया है। पहले इस क्षेत्र में पुरुषों का दबदबा था। लेकिन अब बड़ी संख्या में लड़कियां इसे करियर के तौर पर अपना रही हैं।

अब ज्यादा लड़कियां कानून पढ़ रही हैं। यूनिवर्सिटी में वकालत की पढ़ाई करने वाले लड़के-लड़कियों की संख्या लगभग बराबर होती है। यह ट्रेंड पूरे देश में है।

एक वक्त था जब कोर्ट में बहुत कम महिला वकील नजर आती थीं लेकिन आज इनकी संख्या बढ़ गई है।

कानून से जुड़ी हर घटना पर नजर

वकालत पढ़ाना किसी दूसरे फील्ड के मुकाबले ज्यादा चुनौतीपूर्ण है। नए-नए कानून आते हैं, पुराने कानूनों में संशोधन होते हैं, अदालतों के नए फैसले आते हैं स्टूडेंट्स को इनके बारे में बताना पड़ता है। हमेशा नई जानकारी के साथ मुस्तैद रहना पड़ता है।

रेफरेंस देखना, वेबसाइट्स चेक करना, लगातार चलता रहता है। कोई फिक्स टाइम नहीं होता कि कितनी देर तक पढ़ रही हूं। ऐसे में कई बार अपनी सुध-बुध भी नहीं रहती।

नेशनल-इंटरनेशनल जर्नल में छपती

लीगल रिसर्च मेरा पसंदीदा विषय है। महिलाओं के अधिकार, चाइल्ड राइट्स, हिन्दू लॉज, इंटेलेक्चुअल प्रोपर्टी राइट्स जैसे विषयों पर एनालिसिस करती हूं।

इंटेलेक्चुअल प्रापर्टी राइट्स बिजनेस लॉ का ही एक हिस्सा है। जब पढ़ाना शुरू किया तो लगा कि इतना रिसर्च नहीं कर पाऊंगी। लेकिन इंटरेस्ट बढ़ता गया।

‘प्रिवेंशन ऑफ सेक्शुअल हैरसमेंट एट वर्कप्लेस’ पर भी कई सेशंस किए हैं। नाबालिग रेप विक्टम के अबॉर्शन में कितनी पेचीदिगियां हैं, इनसे जुड़े कानून क्या हैं, इसका भी विश्लेषण किया है।

लीगल रिसर्च के लिए नम्रता को मिला सम्मान।

लीगल रिसर्च के लिए नम्रता को मिला सम्मान।

11 साल शादी चली, अब सिंगल हूं

मैंने 2002 में शादी की, लेकिन चल नहीं पाई। 2013 में पति से अलग हो गई। पिछले 10 सालों से सिंगल हूं। लेकिन इस दौरान कई चुनौतियां का सामना किया है।

समाज पूछता है क्यों हुआ, कैसे हुआ। लेकिन मैं जवाब नहीं देती। नहीं बनी, तो नहीं बनी। नसीब में अलगाव था सो हुआ।

कई बार दूसरी शादी के प्रस्ताव आए, लेकिन मैंने इंकार कर दिया। मेरा कोई भाई नहीं है तो मैंने अपनी मां की देखभाल करने का फैसला लिया।

पत्नी के खाते में सैलेरी आए तो ही वह सक्षम, मजबूत

मैं सिंगल इस वजह से रह पाई हूं क्योंकि आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर हूं। समाज सिंगल वुमन को कहां स्वीकारता है। जब अलगाव हुआ तो डिप्रेशन में रही।

लेकिन नौकरी में थी, क्लासेज ले रही थी, बच्चों के साथ बातचीत हो रही थी और सबसे बढ़कर हर महीने खाते में सैलेरी आ रही थी इसलिए डिप्रेशन से बाहर आ पाई।

मेरा यही मानना है कि चाहे किसी का पति करोड़ों क्यों न कमाता हो, औरत के खाते में हर महीने तनख्वाह आएगी तभी वह मजबूत बन सकती है।

औरत के हाथ में खुद का कमाया हुआ पैसा होना चाहिए।

जो कमाएगा वही अपने लिए फैसले ले पाएगा। पति पर पैसे के लिए निर्भर रहेंगी तो अपनी मर्जी का कभी कुछ नहीं कर पाओगी।

आर्थिक आत्मनिर्भरता से मजबूती आती है। आत्मविश्वास बढ़ता है। फैसले लेने का खुद पर भरोसा पैदा होता है। इसलिए आज की तारीख में हर महिला को अपने पैरों पर खड़ा होना चाहिए।

बेटियों को बेटों से बढ़कर पाला, मजबूत बनाया

मेरे पिता बहुत पढ़े-लिखे थे। कंपनी सेक्रेटरी और आईसीडब्ल्यूए किया था। बड़ौदा में लंबे समय तक कॉरपोरेट में रहे।

करीब 10 वर्षों तक गोवा में भी रहे। हम तीनों बहनों का जन्म भी गोवा में हुआ।

वह प्रगतिशील थे। चारों बेटियों को बेटों का दर्जा दिया। बड़ौदा के बेस्ट स्कूल में पढ़ाया। पढ़ने के लिए हमेशा प्रोत्साहित भी किया।

आसपड़ोस में भी पापा को इस बात के लिए जाना जाता कि उन्होंने अपनी बेटियों को मजबूत और आत्मनिर्भर बनाते हुए एक मुकाम पर पहुंचाया है।

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