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Purnima saw that there was a stain of vermillion on Indra’s shirt, but Purnima does not wear this color of vermillion. | वो आई थी: पूर्णिमा ने देखा इंद्र की कमीज़ पर सिन्दूर का दाग़ लगा था, लेकिन इस रंग का सिन्दूर तो पूर्णिमा नहीं लगाती

  • February 14, 2024

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1 घंटे पहले

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एक छोटा सा शहर था और उस छोटे से शहर का लड़का इंद्र। पिता नहीं थे उसके। घर में बस मां और छोटी बहन सुमुखी। पिता के समय से ही एक मामूली बिजली के उपकरणों की जमी जमाई दुकान थी। उसी को संभालता था इंद्र। बी.ए. करते ही मां से जिद की कि उसे मैथिली से ही ब्याह करना है। वही मैथिली जो पिछले दो सालों से उसके साथ रामलीला में सीता बन रही थी। मां तिनक गईं। गरीब परिवार की लड़की तिस पर सांवली। बेटे के ब्याह के लिए कैसे कैसे तो सपने देख रखे थे उसने। जो भी हो मैथिली ब्याह कर इंद्र के घर आ ही गई। मैथिली सांवली जरूर थी लेकिन मुख की गढ़न अनुपम थी उसकी। विधवा मौसी के घर रह कर पली बढ़ी अनाथ लड़की…मैथिली। स्वर्गीय मां के दो चार सोने के गहने भी साथ ले कर आई थी। गहनों के साथ थी एक जोड़ी चांदी की चमकदार, घुंघरूदार पायल।

सोलह बरस की मैथिली ने ससुराल आते ही खुद से दो साल छोटी ननद सुमुखी को पटा लिया। दुनिया के खेल खेला करतीं दोनों ननद भाभी। न जाने कहां कहां की बातें, कैसे कैसे खेल। गुड्डे गुड़िया, रस्सी कूद, छुपन छुपाई, इक्कट दुक्कट। कुढ़ी चिढ़ी सास बेटी से तो कुछ न कहती लेकिन उसका सारा गुस्सा मैथिली पर निकलता। मैथिली भी एक नम्बर की ढीठ। चार बार बुलाने पर एक बार सुनती। रसोई अकेले सास ही संभालतीं। इसीलिए मैथिली को अक्सर मारपीट भी देतीं। मैथिली हुड़क कर रो देती फिर खुद ही चुप हो जाती। सास को रखने के लिए उसने अपना एक भी गहना नहीं दिया था। ये भी शिकायत बहुत बड़ी थी। सास के तीखे, कड़वे बोल, दहेज कम लाने का ताना मैथिली का जी दुखाते। मार पिटाई भी साथ साथ चलती रहती। मैथिली को सुबकते देख कर इंद्र परेशान हो उठता। लेकिन जल्द ही सब कुछ भूल कर मैथिली फिर से खिलखिलाने हंसने लग जाती।

उस शाम मैथिली नहीं दिखी। कहीं भी नहीं। ढूंढते हुए इंद्र घर के पिछवाड़े चला गया जहां साग सब्ज़ी उगाई जाती थी। उधर एक अंधा कुआं भी था जिसके अगल बगल दो पेड़ लगे थे। दुखी होने पर मैथिली अक्सर उधर जा कर बैठ जाती थी। आज मुंडेर पर मैथिली की एक पायल रखी थी बस। चांदी का चाभी का गुच्छा, लाल बुंदकी वाली ओढ़नी, और…और…और उसका मोबाइल भी। सब कुछ दिखा लेकिन वो नहीं दिखी। कुएं में टॉर्च की रोशनी फेंकी इंद्र ने काफी देर तक। कई बार मैथिली को पुकारा। कुछ भी जवाब नहीं मिला। बार बार मां को आग्नेय दृष्टि से देखता। अंततः सकपका कर मां कह उठी –“ ऐसा तो कुछ भी नहीं कह दिया मैंने जो तेरी बहू को बुरा लगे।’’

अगले दिन इंद्र रेल की पटरी पर भी देख आया लेकिन मैथिली नहीं मिली।

“तेरी बहू भाग गई है,’’ मां ने घृणा से कहा।

“वो ऐसा नहीं कर सकती,’’ इंद्र बुदबुदाया –“कहां चली गई हो तुम ?’’ उसकी पलकों की कोरों पर आंसू की एक बूंद छलकी थी। उसके चेहरे पर मैथिली को खोज खोज कर थके होने की खीज थी। खिड़की के पार हरसिंगार बटोरती मैथिली की दो दिन पहले की अल्हड़ छवि याद आई उसे। हरसिंगार अभी भी बिखरे थे लेकिन मैथिली नहीं थी। सितम्बर अक्टूबर की जादुई सुबह में वो हरसिंगार के नीचे बैठ जाती। मिट्टी में, ज़मीन पर। धीमे धीमे एक एक करके नन्हे फूल उस पर गिरते। धरती देखते ही देखते जगमगाने लगती और मैथिली का आंचल भी। इंद्र ने अपने आंसुओं का खारापन महसूस किया।

दिन बीतते गए। मैथिली का कुछ पता नहीं चला। कुछ समय बाद इंद्र की बहन ने भाभी के श्रृंगार प्रसाधन इस्तेमाल करना शुरू कर दिए। मां रसोई में काम करती और अनायास ही ‘मैथिली’ को पुकारते खिसिया जाती। इंद्र ने अपनी बिजली की दुकान पर कुछ अधिक ही जगमगाहट कर ली थी। दुकान मुनाफे में चल रही थी। दो बरस बाद इंद्र फिर से दूल्हा बना। इस बार एम. ए. पास दुल्हन आई– पूर्णिमा। मैथिली की तरह अल्हड़, डरपोक नहीं। परिपक्व, आत्मविश्वासी। ब्याह से पहले उसी शहर में पढ़ाती थी। सो नौकरी ब्याह के बाद भी चलती रही। नित नई नकोर साड़ियां पहन कर पढ़ाने जाती। घर के काम के लिए महरी लगा ली थी।

इस ब्याह के बाद इंद्र दुकान से कुछ जल्दी वापस आने लगा था। गजरा, कुछ मिठाई, पेस्ट्री दुकान से वापसी के समय लेता आता। पूर्णिमा पूरे अधिकार के साथ अपनी और इंद्र की चाय लेकर अपने कमरे में चली जाती। इंद्र राग से, अनुराग से पूर्णिमा को देखता और पूर्णिमा मान से, मनुहार से उसे चाय नाश्ता देती। इंद्र मोगरे का गजरा उसके केशों में लगा कर एक तप्त चुम्बन उसकी गर्दन पर अंकित कर देता। इसके बाद वो गजरा शय्या पर सुसज्जित हो जाता। पूर्णिमा कुछ इतरा कर, इठला कर कमरे से बाहर चली जाती।

मैथिली के दो चार गहने सुमुखी के ब्याह में दे दिए गए थे। पूर्णिमा के पास बस एक पायल ही रह गई थी मैथिली की जिसका जोड़ा गुम था। लेकिन उसे कोई शिकायत नहीं थी। मैथिली की कोई भी तस्वीर घर में नहीं थी। शायद कोई उसकी यादों को भी सहेजना नहीं चाहता था। पूर्णिमा अक्सर मैथिली के बारे में सोचा करती थी।

एक बार बहुत पूछने पर सुमुखी ने बस इतना ही बताया था कि पहली वाली भाभी को अम्मा ‘बहरी’ बुलाती थीं और वो अम्मा को ज़रा भी पसंद नहीं थीं। उस दिन भाभी ने चांदी की पायल पहनी थी और उसके बजते हुए घुंघरू की आवाज़ सुन कर खुश हो रही थीं। अम्मा के चार पांच बार बुलाने पर भी जब उन्होंने कोई ध्यान नहीं दिया तो अम्मा ने उनके पांव को गर्म चिमटे से दाग दिया था। मैथिली भाभी हुड़क कर रो दी थी और रोते हुए बाहर चली गई थी। तब से उसे किसी ने नहीं देखा। सुमुखी के चेहरे पर अपराध भाव था।

उस रात पूर्णिमा ने एक स्वप्न देखा। भोर का सपना– किसी ट्रेन के डिब्बे में कोई लड़की बैठी हुई है। उसका रंग सांवला है। एक झलक नयन, नक्श की दिखी, बिल्कुल स्पष्ट। बस पल भर में ही उसकी मुखाकृति धुंधली पड़ जाती है। सुनहरी किनारी की लाल बुंदकी वाली साड़ी जगमगाती है। मांग में सिन्दूर, माथे पर बिंदिया। बिल्कुल बालिका वधू। पूर्णिमा ध्यान से देखना चाहती है लेकिन तभी छम्म से कुछ बज उठता है। पूर्णिमा की दृष्टि उसके पांव तक जाती है। छोटे छोटे आलता लगे पांव। वो लड़की चुटकी से अपनी साड़ी कुछ ऊंची करती है। एक पांव में बड़े बड़े फफोले और दूसरे पांव में चांदी की घुंघरूदार पायल। पूर्णिमा नींद में ही चौंक जाती है। एक बार फिर चेहरा देखने की कोशिश करती है लेकिन धुंधला सा है सब कुछ…।

एक स्वर बारीक सा –“उसने मुझे बहुत तंग किया, मारा, लेकिन मैंने सबको माफ़ कर दिया।’’

“हां, माफ़ कर देना ही सही है,’ ’पूर्णिमा को अपना ही स्वर अजनबी लगा।

“सात फेरे तो मेरे साथ भी लिए थे। सात जन्मों के लिए सात वचन भी…फिर क्यों किया ऐसा? प्रेम, प्यार सब कुछ झूठ है क्या? बुढ़िया ने मुझे जलते चिमटे से मारा…देखो दुखता है…लेकिन मैंने माफ़ किया सबको।’’

पूर्णिमा को उसकी काजल भरी आंखें दिखीं। वो लड़की उठी और पूर्णिमा से सट कर बैठ गई, “ उधर भी चैन कहां ? ये पायल भी न… जब तब बज ही उठती है…तुमने मेरा जोड़ा तो ले लिया…,’’ एक खनकदार हंसी…, ‘’वो तुम्हें प्यार करता है न ?’’ उसका स्वर हल्का लेकिन स्पष्ट था –“ किसी के चले जाने पर अकेले बिल्कुल नहीं जिया जा सकता? खुश रहने का अधिकार सबको है। मैं रोकने वाली कौन…? माफ़ किया सबको…,’’ उसका स्वर हर तरफ से आ रहा था, “ तुम्हारी मुंह दिखाई भी तो देनी अभी बाकी है…।’’

पूर्णिमा अर्धनिद्रा में दूल्हा बने इंद्र को देख रही है…दुल्हन कोई और है। फिर इंद्र नहीं दिखता। ट्रेन वाली लड़की, उसका कोमल मुख… आधे घूंघट से ढका। एकदम से नींद टूट गई…आधी खुमारी शेष थी। पूर्णिमा ने बिस्तर छोड़ दिया। समय देखा– भोर के चार बजे थे। कुछ उजाला फूट रहा था। खुले बालों का जूड़ा बांधते हुए वो खिड़की के पास आ कर खड़ी हुई। एकाएक उसे लगा जैसे कोई अभी अभी हरसिंगार के नीचे से उठ कर गया है। अनायास ही उसने देखा खिड़की की मुंडेर पर जोड़े की दूसरी पायल रखी थी। उसके माथे पर पसीना छलछला आया। उसने जोड़े की दोनों पायलें मिला दीं। छन्न…छन्न…छन्न…घुंघरू बज उठे और इंद्र जाग गया। पूर्णिमा ने देखा उसकी कमीज़ पर सिन्दूर का दाग़ लगा था। लेकिन इस रंग का सिन्दूर तो पूर्णिमा नहीं लगाती।

“वो आई थी इंद्र…तुम्हारे पास…मेरे पास…कुछ देने के लिए आई थी वो…,’’पूर्णिमा भावुक थी।

“कौन आई थी…कब…कैसे…कहां? मुझे तो कुछ पता नहीं।’’ इंद्र पसीने पसीने हो कर पूर्णिमा के हाथ में पकड़ी दोनों पायलों को विस्फारित दृष्टि से देख रहा था। पूर्णिमा के मन का आवेग रुदन बन कर फूटने को था। उसने देखा खिड़की के पार लगे हरसिंगार के नीचे के सारे फूल गायब थे। शेष थी बस एक तेज़ मोहक ख़ुशबू।

पता नहीं कैसे बेमौसम कहीं एक कोयल कूक उठी और इंद्र को मैथिली की इतनी याद आई मानो वो उसके बिल्कुल पास आ कर बैठ गई हो।

पूर्णिमा अनायास ही इंद्र की छाती पर सिर रख कर मैथिली के लिए बिलख बिलख कर रो दी –“वो अब कभी नहीं आएगी। वो बस हमारी सुखी गृहस्थी देखने आई थी। तुम्हें अंतिम विदा देने…तुमसे अंतिम विदा लेने। चलो उसे प्रणाम करें।”

…फिर पूर्णिमा ने पायल का वो जोड़ा माथे से लगा कर भगवान के पास रख दिया। दिन बीतते गए…बीतते गए।…और सच में वो फिर नहीं आई ।

-आभा श्रीवास्तव

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