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Question on women’s respect in India | भारत में महिला सम्मान पर सवाल: महिला हॉकी टीम की कोच का इस्तीफा; महिला वोटर्स चाहे बढ़ें लेकिन तरक्की में रुकावटें कायम

नई दिल्ली2 दिन पहलेलेखक: मरजिया जाफर

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भारतीय महिला हॉकी टीम की कोच जेनेके शोपमैन ने कहा है कि इस देश में पुरुष टीम को ज्यादा अहमियत दी जाती है। नीदरलैंड से इंडिया आईं भारतीय महिला हॉकी टीम की कोच शोपमैन को लगता है कि टीम के कोच के तौर पर उन्हें सम्मान नहीं मिला और उन्हें कमतर नजर से देखा गया। शोपमैन का कहना है कि वह एनालिटिक कोच के तौर पर भारत आई थीं। लेकिन उन्हें कोई महत्व नहीं मिला।

वह कहती हैं, ’मुझसे पुरुष कोच के मुकाबले अलग बर्ताव किया जाता है। यह सब कुछ बहुत मुश्किल है, बहुत ही मुश्किल। आपको पता है, मैं एक ऐसी संस्कृति से आती हूं जहां स्त्री का बहुत सम्मान है और उसे बहुत महत्व दिया जाता। मुझे यहां ऐसा महसूस नहीं हो रहा है। यहां तक कि जब मैं सहायक कोच थी तब कुछ लोग मेरी तरफ देखते भी नहीं थे। लेकिन फिर जैसे ही आप मुख्य कोच बनते हैं अचानक लोग आप में इंट्रेस्ट लेने लगते हैं। मैं इन सब स्थितियों से जूझती रही हूं। नीदरलैंड की हूं और अमेरिका में भी काम कर चुकी हूं। एक महिला के रूप में मुझे यह देश महिलाओं को लेकर सख्त लगा।’

भारतीय महिला हॉकी टीम की कोच के बयान और इस्तीफे ने भारत में महिला खिलाड़ियों के साथ हो रहे भेदभाव की बहस को और हवा दी है। क्योंकि उन्होंने सीधे और स्पष्ट शब्दों में यहां तक कह दिया कि भारत महिलाओं के रहने लायक न

महिलाओं के साथ ज्यादती की ताजा मिसाल साक्षी मलिक

जेनेक शोपमैन के बयान में भारत में महिलाओं के साथ हो रही ज्यादती की झलक के साथ ताजा मिसाल भी मौजूद है। जब 23 दिसंबर 2023 में कुश्ती महासंघ के प्रमुख चुनाव के बाद साक्षी मलिक ने इस्तीफा दे दिया था। साक्षी मलिक रियो ओलिंपिक 202 में कांस्य पदक विजेता रही हैं।

इज्जत और अहमियत की लड़ाई

सवाल है कि भारत में ऊंचे पदों पर महिलाओं की मौजूदगी न के बराबर क्यों है? जो महिलाए ऊंचे ओहदे पर पहुंच भी गई हैं, तो उन्हें इज्जत और अहमियत पाने का हक क्यों नहीं मिलता? अगर मिलता भी है तो उसे कितनी जद्दोजहद से गुजरना पड़ता है। देश की बेटी पढ़ रही, आगे बढ़ रही है, बावजूद इसके सियासत, ब्यूरोक्रेसी और कॉरपोरेट में बड़े पदों पर महिलाओं की हिस्सेदारी न के बराबर है।

इतिहास खंगालने के दौर में देखो महिलाओं का शौर्य

इतिहास खंगालने का दौर चल रहा है, तो क्यों न उन महिलाओं के बारे में जाना जाए जिन्होंने भारत को भारत बनाने में अहम भूमिका निभाई। कितनी ही महिलाओं ने अपना खून-पसीना एक करके इस देश को आगे बढ़ाया है।

हर क्षेत्र में महिलाओं की हिस्सेदारी में कमी

अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (आईएमएफ) के मुताबिक भारत दुनिया की सबसे तेजी से बढ़ती अर्थव्यवस्थाओं में से एक है। भारतीय अर्थव्यवस्था में 6.8 प्रतिशत की वृद्धि का अनुमान है। 2030 तक भारत दुनिया की तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बन सकता है। भारत को सिर्फ अमेरिका और चीन से पीछे रहने की उम्मीद है। आर्थिक विकास के बावजूद, देश की अर्थव्यवस्था, राजनीति और समाज में महिलाओं की भागीदारी कम है।

महिला वोटर्स में इजाफा, उम्मीदवारी में कम

चुनाव आयोग की ताजा रिपोर्ट में महिला वोटर्स के रजिस्ट्रेशन संख्या साल 2014 के चुनावों में 397,049,9451 की तुलना में साल 2019 में 438,491,517 साथ बढ़ोतरी दर्ज की गई। पुरूष और महिला के बीच का फर्क 2014 में 1.46 प्रतिशत की तुलना 2019 में घटकर 0.10 प्रतिशत ही रह गया। 8 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में लोकसभा चुनाव 2019 में पुरूषों की हिस्सेदारी के मुकाबले महिला वोटर की संख्या में रिकॉर्ड बढ़ोतरी हुई।

लोकसभा चुनाव 2019 में सभी विधानसभा क्षेत्रों में कम से कम एक मतदान केंद्र का मैनेजमेंट महिलाओं के हाथों में था। जिसमें पुलिस अधिकारी, सुरक्षाकर्मियों से लेकर सभी स्टाफ महिलाओं का ही रहा। 2014 के लोकसभा चुनाव में चुनी गई महिला सांसदों की संख्या 62 थी जो 2019 में बढ़कर 78 हो गई। लेकिन बावजूद इसके राजनीतिक दल महिलाओं को टिकट देने से कतराते रहे हैं। इस अंतर को ग्राफिक के जरिए समझने की कोशिश करते हैं।

आगामी चुनाव में महिला वोटर बढ़ चढ़कर हिस्सा लेंगी

चुनाव आयोग ने शुक्रवार को घोषणा की कि आगामी आम चुनावों में मतदान करने के लिए 96.88 करोड़ लोग रजिस्टर्ड हुए हैं। इस बार कुल मतदाताओं में 49.7 करोड़ पुरुष मतदाता (2019 से 6.9% अधिक) और 47.1 करोड़ महिलाएं (9.3% अधिक) शामिल हैं।

यह देश की आबादी का 66.8% है। तमिलनाडु, आंध्र समेत 12 राज्यों में महिला वोटर अधिक मतदाताओं के जेंडर रेशियो में 1 हजार पुरुष वोटर पर महिलाओं की संख्या में सुधार हुआ है। जो 2019 में 928 से बढ़कर इस बार 948 हो गया है। पिछले पांच सालों में 3.2 करोड़ पुरुषों की तुलना में 4 करोड़ से ज्यादा महिला वोटर जुड़ी हैं। लोकसभा चुनाव 2019 में 43.1 करोड़ महिला मतदाता थीं। इस साल महिला वोटर्स की संख्या में 9.3% का इजाफा हुआ है। इस तरह देखा जाए तो पुरुष वोटर्स के मुकाबले महिला वोटर्स की संख्या बढ़ी है।

देश में महिला वोटर का प्रतिशत तो बढ़ रहा है लेकिन राजनीतिक प्रतिनिधित्व में वो पीछे है। इलेक्शन कमिशन ऑफ इंडिया की रिपोर्ट के मुताबिक अक्टूबर 2021 तक संसद सदस्यों में से 10.5 प्रतिशत महिलाएं हैं। सभी राज्य विधानसभाओं के लिए, महिला विधायकों का औसतन प्रतिनिधित्व 9 प्रतिशत है।

वहीं महिला जनप्रतिनिधित्व के मामले में भारत की रैंकिंग उसी रफ्तार से गिरी है लगता है उसी रफ्तार महिला सम्मान को लेकर भी सोच गिरावट आई है। एक इंटरनेशनल महिला कोच की यह बात कहना कि भारत महिलाओं के रहने लायक देश नहीं है। उस देश के लिए इससे बड़ी शर्मनाक बात क्या होगी। यह स्लोगन कि ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ के आगे, ‘बेटी का सम्मान करना सीखो, सिखाओ’। शायद इन शब्दों का भी जोड़ना जरूरी है।

ब्यूरोक्रेसी में भी महिलाओं की मौजूदगी कम

केंद्र सरकार की 2011 की रोजगार जनगणना के मुताबिक, भारतीय प्रशासनिक सेवा (आईएएस) के आंकड़ों और इसके कुल कर्मचारियों में से 11 प्रतिशत से भी कम महिलाएं थीं। 2020 में यह 13 फीसदी तक पहुंच गया। 1951 और 2020 के बीच पद काबिज होने वाले 11,569 आईएएस अधिकारियों की कुल संख्या में से सिर्फ 1,527 महिलाएं ही शामिल हुई। वहीं, साल 2022 तक, आईएएस सचिवों में सिर्फ 14 फीसदी ही महिलाएं थीं यानी 92 पदों में से महज 13 पर महिलाएं थीं। प्रमुख पदों पर तो हालात और भी ज्यादा गंभीर है। राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में सिर्फ तीन महिला मुख्य सचिव हैं। भारत में कभी कोई महिला कैबिनेट सचिव नहीं बन पाई। गृह, वित्त, रक्षा और कार्मिक मंत्रालय में भी कोई महिला सचिव नहीं रही है। ब्यूरोक्रेस में 2011 और 2020 के बीच केवल 2 प्रतिशत ही इजाफा हुआ है।

महिलाएं अपने खुद के फैसले लेने की हकदार नहीं

बात यहीं खत्म नहीं होती। महिलाओं की काबिलियत को हर क्षेत्र में कम आंका जा रहा है। पुरूषों के मुकाबले कम वेतन, सीमित संसाधन और नेटवर्किंग के सीमित रास्ते मिलते हैं। यह महिलाओं के लिए बड़ी चुनौती है।

सामाजिक दायरा और छोटी सोच

सामाजिक कार्यकर्ता सुषमा सिंघवी कहती हैं कि भारत में महिलाओं के लिए क्या सही है और क्या गलत ये सदियों पहले से ही तय कर दिया गया, जो आजतक नहीं बदला। हर पीढ़ी सोच की उसी लकीर को पीट रही है। लीडरशिप पदों में जेंडर इक्वालिटी ऐतिहासिक मुद्दा रहा है, जिसमें पुरुषों को महिलाओं के मुकाबले उच्च स्तरीय भूमिकाओं में अधिकार दिया गया है। इस तरह की असमानताएं कई क्षेत्रों में बनी हुई हैं। इन बाधाओं को तोड़ना एक महिला की योग्यता पर विचार किया जाना है उनके लिंग के आधार पर नहीं। कई परिवारों में आज भी महिलाओं की लगाम परूषों के हाथो में है लेकिन ये भी सच है कि धीरे धीरे ही सही परिवर्तन हो रहा है।

बात निकली है तो दूर तलक जाएगी

भारत में महिलाओं का महिमामंडन करने वाले लोगों से सिर्फ एक सवाल है कि क्या देश के ऊंचे पदों और बड़े संस्थाओं से महिलाओं का बहिष्कार करना लोकतंत्र के सिद्धांतों के लिए सही है? हर क्षेत्र में जेंडर पॉलिटिक्स का लेंस लगाकर जब तक चीजों को देखा जाता रहेगा तब तक महिला सशक्तिकरण के भारी भरकम शब्द हवा में भरे गुब्बारे जैसे ही बने रहेंगे। दिमाग में जमी छोटी सोच की काई को बाहर निकालने में और कितना वक्त लगेगा?

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