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Risk of heart attack in divorced men | तलाकशुदा मर्द में हार्ट अटैक का रिस्क: पुरुष में डिप्रेशन दोगुना, 30% डॉक्टर के पास नहीं जाते; डिवोर्स महिला के लिए धब्बा

नई दिल्ली22 घंटे पहलेलेखक: संजय सिन्हा

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तलाक हमेशा दुखदायी होता है स्त्री हो या पुरुष, दोनों के जीवन में एक ऐसा बवंडर आता है जो सबकुछ उड़ा ले जाता है। दिन और रात का ही चैन नहीं छिनता, बल्कि जीवन भर का दुख ढोने को विवश होना पड़ता है।

कुछ लोग तलाक के बाद स्थितियों का सामना कर लेते हैं लेकिन कई टूट जाते हैं तन से मन से और आर्थिक रूप से।

पुरुष और स्त्री दोनों पर तलाक के साइड इफेक्ट्स अलग-अलग होते हैं।

30% तलाकशुदा पुरुष डॉक्टर के पास नहीं जाते

तलाक का असर स्त्री-पुरुष दोनों पर पड़ता है। लखनऊ स्थित साइकोथेरेपिस्ट स्निग्धा मिश्रा बताती हैं कि एक्स हसबैंड या एक्स वाइफ में कौन ज्यादा पीड़ित है, कौन मानसिक दुख से ज्यादा गुजरता है, कौन इमोशनली टूट जाता है यह उन दोनों के रिलेशनशिप और रिश्ते को बचाने की कोशिशों पर निर्भर करता है।

इसमें यह जानना महत्वपूर्ण कि तलाकशुदा व्यक्ति चाहे वो स्त्री हो या पुरुष शादी के टूटने के बाद चुनौतियों का किस तरह सामना करता है।

‘द डिवोर्स एक्सपीरियंस: ए स्टडी ऑफ डिवोर्स एट मिडलाइफ एंड बियोंड’ नामक रिसर्च में बताया गया कि तलाक के बाद उबरने के लिए पुरुष बहुत कम प्रोफेशनल हेल्प लेते हैं। वो महिलाओं की तुलना में साइकोलॉजिस्ट और काउंसलर्स के पास कम जाते हैं।

इस रिसर्च में बताया गया कि 30% तलाकशुदा पुरुष जो अकेले रह रहे थे, वो एक साल के दौरान डॉक्टर के पास नहीं गए।

शादीशुदा मर्द Vs तलाकशुदा मर्द, किसकी मृत्यु दर अधिक

वैवाहिक जीवन जीने वाले स्त्री-पुरुष तलाकशुदा अकेलापन झेल रहे स्त्री-पुरुषों से ज्यादा सुखी होते हैं।

‘द जर्नल ऑफ मेन्स हेल्थ’ ने अपनी रिपोर्ट में बताया है कि शादीशुदा मर्दों की तुलना में तलाकशुदा मर्दों की मृत्यु दर 250% अधिक होती है। तलाकशुदा मर्दों को तनाव और चिंता खा जाती है।

इससे उनकी बीमारियों से लड़ने की क्षमता यानी इम्यून सिस्टम कमजोर हो जाता है। उनमें कैंसर का रिस्क और दिल की बीमारियां बढ़ जाती हैं।

शादीशुदा मर्दों के मुकाबले तलाकशुदा मर्दों में हार्ट अटैक का अंदेशा ज्यादा रहता है।

महात्मा गांधी इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज, वर्धा के प्रोफेसर डॉ. हर्षल साठे बताते हैं कि डिवोर्स के बाद अधिकतर स्त्री-पुरुषों की रूटीन अव्यवस्थित हो जाती है।

उनका खानपान डगमगा जाता है, उनमें आलस बढ़ता है, वो एक्सरसाइज नहीं करते, पुरुषों में इसका गहरा असर देखने को मिलता है।

डिवोर्स के बाद घर में पत्नी नहीं होती जो शराब-सिगरेट पीने जैसी आदतों पर रोके-टोके। जब पत्नी नहीं होती तो खानेपीने की चिंता करने वाला कोई नहीं होता जिससे पुरुषों की सेहत बिगड़ती जाती।

अमेरिकन सोशियोलॉजिकल एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार, डिवोर्स के बाद अधिकतर पुरुषों में शराब पीने की लत बढ़ जाती है।

जब पुरुष की शादीशुदा जिंदगी पर विराम लगता है तो वह खुद को शराब में डुबोने लगता है। नतीजा उसकी सेहत पर बुरा असर पड़ता है।

डिवोर्स के बाद पुरुषों में डिप्रेशन दोगुना

‘पोस्ट डिवोर्स डिप्रेशन’ यानी डिवोर्स के बाद डिप्रेशन। डिवोर्स के बाद महिलाओं की तुलना में पुरुषों में डिप्रेशन की वजहें दोगुनी हो जाती हैं। तलाकशुदा पुरुषों में एंग्जाइटी और हाइपरटेंशन आम बात है।

कई बार स्थितियां इतनी बिगड़ जाती हैं कि लोग सुसाइड तक कर लेते हैं। अमेरिका में हर दिन 10 तलाकशुदा पुरुष सुसाइड करते हैं।

भारत में 33% सुसाइड का कारण फैमिली प्रॉब्लम है। हालांकि भारत में 0.5% तलाकशुदा मर्द ही सुसाइड कर रहे हैं। इसकी वजह भारत में तलाक की दर का कम होना भी है।

‘तलाक के मुकदमे और भारत में बढ़ता स्त्री द्वेष: एक वकील की डायरी’ में वकील प्रखर बताते हैं कि तलाक मर्दों के जीवन को तबाह कर देता है। इसे एक केस से समझ सकते हैं।

‘पति की नौकरी छूट चुकी थी। पत्नी सरकारी नौकरी में थी इसलिए घर वही चला रही थी। दोनों ने लव मैरिज किया था। लड़के के परिवार वाले इस शादी के खिलाफ थे, इसलिए लड़का अपनी ससुराल में ही रहता।

धीरे-धीरे दोनों में लड़ाई होने लगी। पति गिरफ्तार हो गया। आपसी सेटलमेंट की बात हुई। पत्नी जिद पर अड़ी थी कि पति लिखित माफीनामा दे और साथ में रहे।

मामला सुलझा नहीं। 3 महीने बाद पति जेल से छूटा। वह दोबारा पत्नी के घर पहुंचा तो दोबारा मारपीट और जेल भेजने की धमकियां मिलने लगी। पति तंग आ चुका था।

उसमें बर्दाश्त करने की हिम्मत नहीं थी। रेल पटरी पर उसका शव मिला।’

साइकेट्रिस्ट डॉ. वी सेंथिल रेड्‌डी बताते हैं कि तलाकशुदा स्त्री और पुरुष दोनों की मानसिक स्थिति गड़बड़ हो जाती है।

तलाकशुदा होने का स्टिग्मा महिलाओं में अधिक, पुरुषों में कम

राजस्थान यूनिवर्सिटी में सोशियोलॉजी की एसोसिएट प्रोफेसर डॉ. रश्मि जैन कहती हैं कि अगर कोई महिला तलाक लेती है तो उन पर परिवार और समाज का प्रेशर अधिक रहता है।

उन पर तलाकशुदा होने का एक धब्बा लग जाता है।

पुरुषों को इस तरह के कलंक का सामना नहीं करना पड़ता। पुरुष दोबारा शादी कर सकता है, उन पर ज्यादा टीका टिप्पणी नहीं होती लेकिन महिला को दोबारा शादी करने में भी समस्याएं खड़ी होती हैं।

वो सिंगल रहे तो दिक्कत है, मायके में परिवार के साथ रहे तो वहां भी बोझ समझी जाती है।

डॉ. रश्मि कहती हैं कि कई ऐसी महिलाएं हैं जो नौकरीपेशा हैं, आर्थिक रूप से मजबूत हैं लेकिन तलाकशुदा होने का धब्बा उन पर लगा है।

समाज उन्हें अच्छी नजर से नहीं देखता। महिला के माता-पिता भी उन्हें सपोर्ट नहीं करते। उनकी यही रट होती है कि मायके से तेरी डोली उठ गई, अब ससुराल से ही अर्थी उठेगी।

लाइफ में इंटरेस्ट ही नहीं रह जाता, बीमारियां खाने लगतीं

कुरुक्षेत्र यूनिवर्सिटी में प्रोफेसर डॉ. विजेंदर सिंह बताते हैं कि तलाक का असर तो एक्स हसबैंड और एक्स वाइफ दोनों पर होता है।

दोनों का इमोशनल कनेक्शन टूट जाता है। पार्टनरशिप टूट जाती है। वो सामाजिक रूप से कट जाते हैं। धीरे-धीरे अकेलापन उन्हें खाने लगता है।

लाइफ में इंटरेस्ट नहीं रह जाता।

तलाक के मामलों में बच्चों की कस्टडी महिलाओं को अधिक मिलती हैं। डॉ. विजेंदर कहते हैं कि पुरुषों पर कई तरह का बोझ पड़ता है। कोर्ट-कचहरी का चक्कर तो लगाना ही पड़ता है, साथ ही मेंटेनेंस और एलिमॉनी का भार उन्हें तोड़ देता है।

एक्स वाइफ अपने बच्चों को पालने-पोसने का लक्ष्य लेकर चलती है और उसके जीवन से धीरे-धीरे निगेटिविटी खत्म हो सकती है लेकिन पुरुष अकेले पड़ जाते हैं।

वो ‘वीकेंड डैड’ बनकर जाते हैं। सप्ताह में एक बार तय समय के लिए ही बाप अपने बच्चों को देख पाता है। इसलिए बाप घुलता जाता है, असमय ही बीमारियों से घिर जाता है।

हसबैंड-वाइफ से ज्यादा फिजिकल-साइकोलॉजिकल और फाइनेंशियल असर बच्चों पर पड़ता है।

हसबैंड-वाइफ की टकराहट कुछ समय खत्म हो जाती है लेकिन बच्चों को जीवनभर का दर्द मिल जाता है। बच्चों का जख्म कभी भर नहीं पाता।

पहले जॉइंट फैमली थी तो समझाने से चीजें ठीक हो जाती थीं। लेकिन चीजों को जितना कानून के दायरे में लाया गया उससे रिश्तों में ‘इगो’ की टकराहट बढ़ी है।

पहले एक दूसरे निर्भरता अधिक होती थी। अब व्यक्ति आत्मनिर्भर होने की वजह से पहले खुद के बारे में सोचता है।

सब इंडिपेंडेंट हो गए हैं। हसबैंड वाइफ दोनों आत्मनिर्भर हैं तो छोटी-छोटी बातों और नाराजगियों पर अलग हो जाते हैं।

बर्दाश्त करने की क्षमता कम हो चली है। परिवार टूटता है। उनमें से कोई एक दूसरे पर निर्भर है उस पर ज्यादा असर पड़ेगा। पूरा परिवार भी कष्ट से गुजरता है।

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