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Rupa could never find Sudarshan, nor did she love anyone else; raising her lover’s son | फर्ज़ और प्रेम: रूपा कभी सुदर्शन को पा न सकी, दूसरे से प्यार भी नहीं किया; प्रेमी के बेटे को पाल रही है

1 घंटे पहले

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“किसी को घर से निकलते ही मिल जाती है मंज़िल कोई उम्र भर सफ़र में ही रह जाता है”

हॉस्टल कॉटेज के लॉन में रूपा के साथ, एक 15-16 साल के लड़के को देख करबेसाख़्ता ये शेर ज़ुबान पर आ गया था। बिना परिचय के ही मैं समझ गयी थी कि वो सुदर्शन का ही बेटा है। वही नाक नक़्श, वैसी ही क़द काठी, बात करने का तरीक़ा भी वो ही। एकदम सुदर्शन की फ़ोटो कॉपी।

रूपा मेरी रूममेट थी। वो सीनियर क्लासेज़ को पढ़ाती थी और मैं प्राइमरी क्लासेज़ को। उम्र में वो मुझसे ६-७ साल बड़ी थी फिर भी, हम दोनों में गहरी छनती थी। एक साथ बोलते, बतियाते दोस्ती निभाते हुए कब आधी रात ढल जाती पता ही नहीं चलता था। रूपा गरीब घर से थी। हमेशा स्कॉलरशिप लेकर ही पढ़ती आयी थी। परिवार में एक छोटा भाई दीपक और मां के अलावा दूसरा कोई नहीं था। दीपक को इसी साल इंजीनियरिंग कॉलेज में दाख़िला मिला था। रूपा, हर महीने अपनी ज़रूरतों पर अंकुश लगा कर भाई को पैसे भेजा करती थी।

रूपा के जीवन में फ़्लाइट लेफ़्टिनेंट सुदर्शन नाम का एक युवक भी था। लंबा, बांका, आंखें हरदम जीने की उमंग से चमकतीं मचलतीं हुई सी। दोनों बचपन से ही एक साथ ग़रीबी के अंधड़ों से गुजरते हुए बड़े हुए थे। फिर एक हादसे में सुदर्शन ने अपने माता पिता को खो दिया। ऐसा कोई करीबी रिश्तेदार भी नहीं था जो सुदर्शन का दायित्व अपने ऊपर ले लेता। ऐसे में उनके एक करीबी परिचित सेठजी ने, उसकी पढ़ाई लिखाई से लेकर वायु सेना में पायलट बनाने तक की पूरी ज़िम्मेदारी अपने ऊपर ले ली थी।

सुदर्शन कभी कभी अपना एयर क्राफ़्ट स्कूल की बिल्डिंग के ऊपर ले आता और फिर कुशल उड़ाक की तरह शोर मचाता, पूरी वादी को गुंजाता हुआ, पल भर में नीले काले पहाड़ों की सीमा लांघ जाता। कभी कभार वो रूपा से मिलने हॉस्टल भी आ जाता था। और फिर दोनों हॉस्टल से बाहर निकल जाते थे। वापस लौटकर रूपा गुनगुनाती हुई बाथरूम में घुस जाती और फिर जब फ्रेश होकर बाहर निकलती तो अपने बाल छितरा कर कहती, “कितना मुश्किल है इस धुंध से निकलना। कपड़े, बाल सब सीलन से भरकर चिपकने लगते हैं”

“कहीं सुदर्शन भी तो।” मैं चुटकी लेती तो वो रूठ जाती। मैं उसे और चिढ़ाती,

“ऐसा मैंने क्या कह दिया? सुदर्शन के साथ अकेली ही घूमती रहती है। एक बार हम से मिलवा तो देती”

और फिर हम दोनों सहेलियां खिलखिला कर हंस देतीं।

इस बीच मेरी भी शादी तय हो गयी। विवेक सीए थे। इकलौते बेटे थे। इसीलिए, परिवार में सब के लाडले भी थे। नवम्बर में स्कूल बंद हुए तो, रूपा से मैंने शादी में आने का वादा लिया। और उसने शादी से ठीक एक हफ़्ता पहले ही दिल्ली पहुंचकर अपना वादा निभाया भी था। नैनीताल से दिल्ली की दूरी ही कितनी थी। मां को, रिश्तेदार औरतों की मीनमेख और सलाह मशविरों से ज़्यादा, रूपा पर विश्वास था। इसीलिए उसके पहुंचते ही उन्होंने, शॉपिंग, टेलरिंग, पार्लर आदि का जिम्मा ,पूरी तरह रूपा पर ही डाल दिया हो।

विदाई की बेला में ऐसा लगा जैसे किसी सहेली का नहीं बल्कि एक बहन का साथ छूट रहा हो। फिर भी स्नेह का बंधन तो अटूट ही होता है। शादी के बाद भी रूपा के मेल, वाट्सऐप और मैसेजेज नियमित रूप से आते रहते थे। एक तरफ़ संयुक्त परिवार, दूसरे विवेक का क्रोधी स्वभाव। मुझमें भी इतना पेशेंस कहां था कि काम के साथ साथ उनकी झल्लाहट भी बर्दाश्त करूं। भरी पूरी ससुराल में मानमनवव्ल का अवसर ही कहां मिलता था। छोटी छोटी बातों पर झगड़ा होता तो मैं, रूठकर मायके चली आती थी।

एक बार, इसी तरह रूठकर गर्मियों में मैं दिल्ली आई हुई थी। तभी, भैया भाभी के साथ, गर्मियां बिताने के लिए कुछ दिन नैनीताल घूम कर आने का प्रोग्राम बन गया। एक तरफ़ रूपा से मिलने की उम्मीद दूसरी तरफ़ विवेक को कुछ दिन और तड़पाने की आकांक्षा! मुझे पूरी उम्मीद थी कि रूपा वहीं हॉस्टल में ही होगी क्योंकि इतना तो तय था कि अगर उसकी शादी हुई होती तो कार्ड मेरे पास ज़रूर आता।

आशा के अनुरूप रूपा, वहीं हॉस्टल में ही थी। मिलते ही अतीत की यादों के पिटारे सिलसिले से खुलने लगे थे। मैंने साफ़ साफ़ स्पष्ट शब्दों में पूछ लिया,

“तेरा स्वीट हार्ट घूम फिर कर ही टाइम पास करता रहेगा या शादी के बारे में भी सोचेगा”

“ बस, इस साल के अंत तक ही।” कहते हुए उसका सिंदूरी रंग लज्जा से लाल हो गया था।

प्रश्नों का रुख़ अब मेरी ज़िंदगी की तरफ़ मुड़ने लगा था। वो एक ही भेंट में मेरी ससुराल के हर सदस्य के बारे ने जान लेने के लिए उत्सुक थी। मैं भी उसके हर प्रश्न का उत्तर देती जा रही थी। लेकिन, जैसे ही उसने विवेक का नाम लिया, मन कसैला सा हो गया। चिढ़ कर बोली, “मैं वो चिख चिख वाला नर्क छोड़ आयी हूं, अब वापस नहीं जाने वाली”

मेरे असंतुष्ट मन ने भरभरा कर अपना ग़ुबार निकाला तो वो बड़ी बूढ़ी की तरह मुझे नसीहतें देने लगी, “क्या पागलों जैसी बातें कर रही है, सात फेरों का बंधन भला, ऐसे कभी टूटता है? विवेक के साथ ज़्यादा समय बिताया कर। तभी आपसी मनमुटाव दूर होंगे”

“घर के काम से फुरसत मिलेगी तब न। बस ये समझ ले नौकरानी बन कर रह गयी हूं मैं”

“तू ख़ुद को उन के घर की नौकरानी का दर्जा दे रही है, पर वो बेचारा भी तो तेरे ही प्यार का ग़ुलाम है”

रूपा ने मुझे समझाना चाहा लेकिन मैंने इस विषय को अपनी तरफ़ से वहीं रोक दिया था।

दो महीने का समय यूं ही बीता। नवब्याहता भैया भाभी अपनी दुनिया में ही मगन थे। दिन में भी दोनों की छेड़ छाड़ और रूठ मनवव्वल चलती रहती। रात में उनके बेडरूम से भाभी की चूड़ियों की खनक और भैया के खिलखिलाने की आवाज़ सुनाई देती तो हृदय पर नाग से लोटने लगते। समय काटे नहीं कटता था।

एक शाम सूरज पेड़ों के पीछे छिपता हुआ ढलान उतर रहा था कि अपना लैपटॉप बैग हाथ में उठाये धीमे कदमों से बंगले की तरफ़ आते हुए विवेक दिखाई दिये।

”न कोई फ़ोन न मैसेज, अचानक कैसे?”

ऐसा लगा कि अपना पूरा ग़ुस्सा भूलकर विवेक के गले लग जाऊं। फिर सोचा थोड़ी नाराज़गी जतलाना भी जायज़ होगा। लेकिन विवेक कहां रुक पाये थे! हुलस कर उन्होंने मुझे अपनी बाहों में क़ैद कर लिया था।

“अब याद आयी आपको हमारी?” उनकी बाहों से अलग होकर मैंने तनिक ग़ुस्से से पूछा तो उन्होंने मुझे और भी कस कर भींच लिया था। बोले, “कुछ खिलवाओगी पिलवाओगी या अपनी नाराज़गी ही दिखलाती रहोगी? एयरकंडीशंड टैक्सी में बैठे बैठे भी हड्डियों के जोड़ तक हिल गए हैं”

मुझे ख़ुद पर अभिमान हो आया था कि मैंने तो एक बार भी न फ़ोन मिलाया न ही मैसेज किया फिर भी आये न दौड़ कर? विवेक कह रहे थे,

“सच मानो, तुम्हारे बिना घर काटने को दौड़ रहा था। सभी तुम्हें याद करते हैं”

“छोड़ो भी अगर मेरी इतनी ही परवाह होती न तुम्हें तो मुझे घर से बाहर जाने ही न देते” मैंने तुनक कर कहा था।

“तुम भी तो उस समय बुरी तरह रूठी हुई थी”

“तो अब तुम्हें मेरा ध्यान कैसे आ गया” मैंने विवेक को छेड़ा था

“वो जो तुम्हारी रूम मेट सहेली है न रूपा, जिसे मैंने शादी में सबसे सुंदर मीराबाई की फ़ोटो गिफ्ट में दी थी, उसी ने फ़ोन करके मुझे यहां आने के लिए कहा था। वैसे, मैं भी तो तुमसे मिलने का बहाना ढूंढ ही रहा था” विवेक ने अपने मन की बात कही।

उस दिन मेरी नज़र में रूपा के लिए प्यार और इज़्ज़त पहले से भी कहीं ज़्यादा बढ़ गयी थी। अपनी समझदारी से उसने हमारी गृहस्थी की ढहती दीवारों को गिरने से बचा लिया था। अगले सप्ताह, मैं, विवेक के साथ दिल्ली लौट आयी थी।

दो साल बीत गये। रूपा की शादी के विषय में कोई भी निर्णय नहीं लिया जा रहा था। रूपा में न पहले वाली रंगत दिखाई देती न ही कुंवारे सपनों की महक। कभी सुदर्शन की बात निकलती भी तो उससे यही निष्कर्ष निकलता था कि, जिन सेठजी ने उसे पाला था,उन की हार्ट अटैक में मृत्यु हो गयी थी।

मृत्युशैय्या पर उन्होंने सुदर्शन से वचन लिया था कि उनकी मृत्यु के बाद उनकी बदसूरत बेटी और फ़ैक्टरी को सुदर्शन ही संभालेगा। मौत के मुंह में जाते व्यक्ति का आग्रह वो ठुकरा सके, इतना पत्थर दिल इंसान सुदर्शन नहीं था।

“सुदर्शन तो फ़ैक्टरी का मालिक बन बैठा। न जाने कितने घर, उसकी फ़ैक्ट्री की बनी ट्यूबलाइटों और बल्बों की रोशनी से रोशन हो गये पर, तुझे क्या मिला? ख़ासा तगड़ा दहेज देकर क्या सुदर्शन सेठजी की बेटी की शादी किसी से करवा नहीं सकता था” मैं ग़ुस्से से लगभग चीख उठी थी।

“फ़र्ज़ और प्रेम के दो पाटों में पिसते सुदर्शन को मैंने ही मुक्त किया था। मनुष्य जीवन की सफलता इसी में है कि वो, उपकारी के उपकार को कभी न भूले बल्कि, उसके उपकार से भी बढ़कर उसका उपकार करदे। आख़िर,मरणासन्न इंसान को दिए गये वचनों का भी तो कुछ मूल्य होता है।” रूपा ने सुदर्शन का ही पक्ष लिया था फिर भी मेरा ग़ुस्सा शांत नहीं हुआ था।

“एक सुदर्शन ही तो रह गया था वचन निभाने के लिए”

“जब मैं कुछ नहीं बोल रही हूं तो तू क्यों इतना उबाल खा रही है” रूपा मुझ पर ही झल्ला पड़ी

“तो फिर तेरी आंखों में ये आंसू क्यों”

रूपा के जीवन में अब सुदर्शन वाला अध्याय समाप्त हो चुका था। मैंने और विवेक ने कितनी कोशिश की उसकी शादी के लिए पर, प्रेम के जिस पौधे को वो आजतक सींचती आयी थी उसे समूल उखाड़ फेंकना शायद उसके वश में नहीं था। फिर उसकी मां की भी मृत्यु हो गयी। इंजीनियर भाई भी ग्रीनकार्ड होल्डर लड़की से विवाह करके अमेरिका जाकर सेटल हो गया था।

रूपा अब बिल्कुल अकेली रह गयी थी। बालों में सफ़ेदी और चेहरे पर उम्र के निशान उभरने लगे थे। पर हमने अभी भी कोशिश नहीं छोड़ी थी। हमारे सिवाय उसका इस दुनियां में था ही कौन?

उन्हीं दिनों विवेक का मित्र राकेश, ट्रांसफ़र होकर दिल्ली आया। साधारण परिवार का एक नौकरीशुदा लड़का था राकेश। सारी उम्र उसने अपने भाई बहनों, और घर ग्रहस्थी की देखभाल में ही बिता दी थी। ज़िंदगी के इस मुक़ाम पर वो, एक अधिक आयु की, सुलझे विचारों वाली पत्नी चाहता था। हमने उसे रूपा की फ़ोटो दिखाई। मना करने का सवाल ही कहां था? हम चाहते थे दोनों, मिलकर एकदूसरे को अच्छी तरह से पहचान लें।

हम लोग कार लेकर नैनीताल के लिए निकल पड़े, यह निश्चय करके कि इस बार जैसे भी हो रूपा को मनाना ही है। लेकिन वहां एक और आश्चर्य हमारी प्रतीक्षा कर रहा था। ऐसे में राकेश का परिचय बेकार था।दूसरे दिन मैंने उसे पकड़ा।

“ये क्या तमाशा लगा रखा है? पंछी भी शाम ढले घरों को वापस लौटते हैं, तू क्या सारी उम्र इसी हॉस्टल में काट देगी?”

“अब मैं अकेली कहां हूँं? देख, मेरा बेटा रवि मेरे साथ है””

“पागल हुई है क्या? पराये बेटे को अपना बेटा कह रही है”

“अब ये मेरा ही बेटा है”

वो गंभीर ही उठी थी। बोली, “ बिज़नेस के दांव पेंच से पूरी तरह से अनजान… फ़ाइटर पायलट सुदर्शन फैक्ट्री नहीं चला सका। घर चलाने और क़र्ज़ा चुकाने में जब सेठ की पूरी जमा पूंजी ख़त्म होने लगी तो, सुदर्शन शराब पीने लगा था। हर दिन पति पत्नी में झगड़ा होता। उसकी पत्नी, मेरा नाम लेकर सुदर्शन को कोसती। इसी लड़ाई झगड़े में रवि मेरे विषय में जान गया। एक रेल दुर्घटना में सुदर्शन की मृत्यु हो गयी। पत्नी, पागल खाने में भर्ती कर दी गयी क्योंकि उसे अब दौरे पड़ने लगे थे। अनाथ बच्चे की ज़िम्मेदारी कौन लेता? रिश्तेदार भी पल्ला झाड़ गये थे। उसी समय रवि को मैं अपने पास ले आयी थी।”

मैं हैरानी से रूपा की कहानी सुन रही थी। रूपा गर्व से बता रही थी,

“सीनियर सेकेंड्री में रवि ने पूरे स्टेट में टॉप किया है। आगे, मेडिकल में जाने का उसका विचार है”

“ और उसकी पढ़ाई का खर्चा तू देगी?”

“ मेरे सिवाय उसका सरपरस्त है ही कौन”

“तुझे कभी समझ में भी आएगा? तूने भाई को पढ़ा लिखा कर उसका करियर बनाया, क्या मिला? पलटकर उसने कभी एक बार तेरी तरफ़ देखा भी कि बहन ज़िंदा है या मर गयी?” मैं बड़बड़ाते हुए उसको सचेत करने की कोशिश करने लगी थी।

“राकेश बाबू से मेरी तरफ़ से माफ़ी मांग लेना। मैं मजबूर हूं”

मैं पैर पटकती हुई वापस लौट आयी थी। मूड बुरी तरह से उखड़ा हुआ था। विवेक कार चला रहे थे। मैं राकेश को सुना रही थी,

“कुछ कमबख़्त होते ही ऐसे हैं, अपना शोषण हर समय करवाने को तैयार। चाहे सारी दुनिया उन्हें रौंद कर निकल जाए लेकिन, उनके कानों पर जूं तक नहीं रौंदेगी”

राकेश ने मेरे ग़ुस्से पर पानी डाला, ”छोड़िये भी भाभी जी, इसी का नाम ही तो प्यार है”

“जो अच्छे भले को अंधा कर दे उस प्यार का क्या लाभ”

“देखूं,शायद कभी आपकी सहेली को जीत पाऊं” गहरी सांस लेकर राकेश ने कहा तो मैं अपना ग़ुस्सा भूलकर, आश्चर्य से उसकी और देखने लगी थी।

-पुष्पा भाटिया

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