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The dark face, the kumkum dot, Aruna’s slim body seemed to be making fun of Surbhi’s slim body. | मन की झूठी जलन: सांवला चेहरा, कुमकुम की बिंदी, अरुणा का छरहरा शरीर जैसे सुरभि की थुलथुल काया का मज़ाक़ बना रहे थे

3 दिन पहले

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टैक्सी की रफ़्तार तेज होने के बावजूद सुरभि के मन को चैन नहीं था। नया शहर नये लोग, अनजान सड़कें। दिल्ली में होती तो अपनी गाड़ी को दौड़ाती हुई अब तक कई किलोमीटर की दूरी तय कर चुकी होती। लेकिन यहां, अपना घर ढूंढ भी पाएगी या नहीं।

सुनसान सड़कें लांघते हुए जीपीएस ने इंदिरा रोड, दस नंबर बंगले तक पहुंचने की सूचना दी तो प्रफुल्ल से मिलने की सुखद कल्पना से उसके पूरे शरीर में सिहरन सी दौड़ गयी थी। बंगले के गेट पर हुंचकर उसने, ड्राइवर से सामान उतरवा कर पैसे दिये और उनींदे कविन को गोद में लेकर दरवाज़े के बाहर लगी घंटी का बटन दबा दिया। पहले का समय होता तो सीढ़ियां लांघते हुए, संभवतः धड़धड़ाती हुए अबतक घर के अंदर पहुंच चुकी होती पर इस समय एक अव्यक्त संकोच ने उसके पांव जकड़ लिए थे। घर तो उसका अपना ही है। प्रफुल्ल के घर को वो अपना ही तो कहेगी। लेकिन पिछले कई दिनों से दोनों के बीच एक दीवार सी खिंच गयी थी, जिसे बींधने का प्रयत्न दोनों ही नहीं कर पा रहे थे। अब तो दोनों के बीच फ़ोन कॉल और मैसेज तक का कोई संपर्क नहीं रह गया था। देहरादून पहुंचने की सूचना भी उसने कविन से ही करवाई थी।

“ सुरभि“ चलो, अंदर चलो। यहां क्यों खड़ी हो”

अपने कंधे पर कोमल स्पर्श पाकर वो चौंकी। रंग पहले से अधिक खिल उठा था। शरीर छरहरा, पर दुरुस्त। सुबह की सैर से लौटे थे शायद।

“अरुणा, सामान उठा कर अंदर रखवा दो”

आदेश देकर उन्होंने, कविन को गोद में उठा लिया फिर सुरभि से प्रश्न किया,

“ अपने आने का मैसेज कर देती।”

“ किया तो था, फोन भी किया था। पता चला तुम दौरे पर गए हुए थे…”

उसने रुक रुक कर कहा

“ओह, शायद मिस हो गया होगा। पिछले दिनों व्यस्तता भी काफ़ी रही”

तभी अरुणा ट्रे में प्रफुल्ल के लिए, नींबू पानी, और सुरभि के लिए चाय बिस्कुट रख गई। पिता पुत्र, बातों में इतने व्यस्त हो गये जैसे सब कुछ एक ही दिन में जानकर समझ लेंगे।

चाय की चुस्कियां लेती हुई वो कनखियों से अरुणा को देखने लगी। सांवला चेहरा, कुमकुम की बिंदी, लाल बॉर्डर की तांत की साड़ी और कोल्हापुरी चप्पल। उसका छरहरा शरीर जैसे सुरभि की थुलथुल काया का मज़ाक़ बना रहे थे। गजब का आकर्षण था उस तरुणी में। चेहरे पर कुटिल मुस्कान घिर आई थी। मांजी को काफ़ी जतन करना पड़ा होगा इसे ढूंढने में?

घर का हर हिस्सा भी साफ़ सुथरा और सुव्यस्थित था। कमरे में नीले रंग के पर्दे और बरामदे में रखे सुंदर क्रोटॉन अतीत के कई दृश्यों को सजीव कर गये थे। लाल रंग सुरभि को पसंद था, जबकि,प्रफुल्ल को हल्का नीला और आसमानी रंग ही भाता था। कहते,”खुले उन्मुक्त आकाश का परिचय देता है ये रंग” पर उनकी कहां चलती थी? सुरभि ने जैसे ही लाल रंग के पर्दों से ड्राइंग रूम को सजाया, प्रफुल्ल ने वहां बैठना ही बंद कर दिया। एक दिन ऐसे ही रंग बिरंगें क्रोटॉन और कौलियस से के कुछ गमले लाकर उन्होंने बरामदे में सजाए, तभी भी सुरभि का पारा सातवें आसमान पर पहुंच गया था,

“छोटी सी बालकनी है। दो लोग तो ढंग से खड़े नहीं हो सकते। गमले कहां रखोगे” पौधे बेचारे बिना खाद पानी के ही सूख गये थे। इस समय अरुणा, छोटी सी कैंची से गमलों के सड़े-गले पत्ते काट कर फेंकती जा रही थी। गुड़ाई करते समय, उस के हिलते डुलते शरीर को देखकर सुरभि की भ्रकुटी तन गयी,

“कैसी बेशर्म औरत है, कम से कम प्रफुल्ल दफ़्तर चले जाते तब कर लेती ये सार संभाल। लेकिन नहीं, मालिक के सामने ही अच्छा बनना है, तभी तो टिकेगी इस आशियाने में। बोर्डिंग लॉजिंग फ्री। ऐसे ही हावभाव दिखा कर ही तो ये औरतें मर्दों को रिझाती हैं” वो धीरे से बुड़बुड़ाई, फिर प्रफुल्ल से मुखातिब हुई,

“माली देखभाल नहीं करता क्या पौधों की?”

“करता है मेमसाहब, पर साहब को उसका काम पसंद नहीं आता”

सुरभि बुरी तरह चिढ़ गयी। पति पत्नी की बातों में ये क्यों दिलचस्पी ले रही है। दो एक बार उसने प्रफुल्ल का ध्यान अपनी और खींचने की कोशिश की लेकिन, प्रफुल्ल, कविन की ही बातों में उलझे रहे।

“कहीं उस का यों अचानक आना उन्हें बुरा तो नहीं लगा!” मन में संदेह का बीज अंकुरित हो उठा।

नौ बजने को आये। प्रफुल्ल के दफ़्तर जाने का समय हो गया था। सुरभि चौके में नाश्ता बनाने के लिए उठने लगी तो, प्रफुल्ल ने सबल रोक लिया था,

“जब से बीमार हुआ हूं, गरिष्ठ भोजन नहीं पचता। मां अरुणा को सब समझा कर गयी हैं। तुम आराम से बैठो”

ब्याह के बाद कुछ ही दिनों में पति पत्नी के बीच संबंधों की खाई, सुरभि के ज़िद्दी और अक्खड़ स्वभाव के कारण ही तो गहराती गयी थी। हर समय सहेलियों की आवाजाही, किट्टी पार्टियां, फ़ेसबुक, इंस्टाग्राम और सोशल मीडिया में उलझी फ़ैशनपरस्त सुरभि को न घरगृहस्थी के किसी काम में रुचि थी, न ही परिवार के सदस्यों से कोई लगाव।’ संबंधों की गरिमा तो मर्यादा के अंश सहेजने से ही बनी रहती है’। इस सच को उसने कभी जानने और समझने की कोशिश ही नहीं की।

“औरत तो परिवार की केंद्र भी है और परिधि भी, उसी से परिवार चलता है, खुशहाली बनी रहती है”

प्रफुल्ल समझाते, लेकिन, सुरभि के ऊपर से सब कुछ चिकने घड़े पर पड़े पानी सा उतर जाता। प्रफुल्ल की मां सोचतीं, मां बनने के बाद सुरभि ख़ुद ब ख़ुद घर गृहस्थी में रम जाएगी, लेकिन वहां भी निराशा ही हाथ लगी।

नन्हे कविन के मुंह में जब आया निवाला डालती तो प्रफुल्ल क्षुब्ध हो उठते। बूढ़ी मां को जब घर का काम करते देखते तो मन रुदन कर उठता। एक बोझ की मानिंद सारे काम निबटाते रहते, लेकिन अपनी पत्नी से वो कभी भी लोहा नहीं ले पाये थे। मन की गहराइयों में जब भी उथल पुथल मचती, लगता, ज्वालामुखी फट पड़ेगा, लावा निकलने लगेगा, मनप्राण ज़ख़्मी होकर छटपटाने ज़रूर लगते थे, पर मुंह से बोल नहीं फूटते थे। प्रफुल्ल शायद समझ गये थे कि,कुछ भी कहकर अपमानित होने से अच्छा है चुप ही रहा जाय

उन्हीं दिनों उनका ट्रांसफर देहरादून हो गया। प्रफुल्ल यहां आना नहीं चाहते थे, इसलिए नहीं कि उन्हें दिल्ली से विशेष लगाव था, बल्कि इसलिए कि वो जानते थे कि, सुरभि कभी भी उनके साथ चलने के लिए तैयार नहीं होगी, ऐसे में अम्मा और कविन को अकेले छोड़ भी नहीं सकते थे। अकेले ही जाने का निश्चय उन्होंने, जब अपनी मां को सुनाया तो उनके धैर्य का बांध ढहने लगा था। प्रफुल्ल को अकेले कैसे चले जाने देतीं?

एक बार उन्होंने सुरभि को समझाने की पुन: कोशिश की कि, “पति पत्नी को एक ही देहरी में रहना होता है। जनम जनम का साथ होता है दोनों का”, पर सुरभि ने मां की बात को समझने के बजाय, समझाना उचित समझा था,

“कुल तीन बरस की ही तो बात है, पलक झपकते ही गुज़र जाएंगे। अब तो कविन भी स्कूल जाने लगा है। अच्छे स्कूलों में दाख़िले आसानी से मिलते कहां हैं? एक बार पूरा तामझाम समेटो फिर वापस आओ। मुझ से नहीं होगा ये सब”

“मेम साहब, दोपहर में क्या बनाऊं” अरुणा के प्रश्न पर सुरभि, अतीत की खोह से निकलकर वर्तमान में लौट आयी थी

“साहब क्या खाते हैं लंच में?”

“आज तो साहब बाहर गये हैं, इसीलिए डब्बा साथ में ही दे दिया था, वैसे तो घर में ही खाते हैं”

सुरभि, उसकी मासूमियत पर चिढ़ गयी। सोच के बगूलों के बीच उसने ख़ुद को भी धिक्कारा, “अपने पति की पसंद नापसंद भी उसे इस गंवार से पूछनी पड़ रही है?”

अपना हक़ उसे छिनता हुआ सा प्रतीत हुआ। फिर भी अरुणा को आलू टमाटर की सब्ज़ी बनाने को कहकर वो अपने बेडरूम में आकर लेट गयी। थकान से पलकें बोझिल थीं, पर नींद कोसों दूर थी।

अरुणा मटर छील रही थी, कविन उसकी पीठ पर झूल रहा था। वो ज्यों ही झुकती, गहरे गले की चोली में से उसका गदराया शरीर दिखाई दे जाता जिसे, लाख कोशिशों के बाद भी उसकी साड़ी का झीना आवरण छिपाने में असमर्थ था। बरसों पुरानी “अंकुर” पिक्चर की दलित जाति की शबाना और ज़मींदार अनंतनाग का अवैध संबंध अचानक सजीव हो उठा था उसकी आंखों के सामने। पत्नी के वापस लौटने के बाद अनंतनाग ने ऐसा शराफ़त का लबादा ओढ़ा कि,बेचारा शबाना का विकलांग पति मुंह खोलने के बाद पिटता ही रह गया। पुरुषों का क्या? जब विश्वामित्र जैसे तपस्वी की चेतना को मेनका ने भंग कर दिया तो,प्रफुल्ल तो साधारण पुरुष हैं। मां ने बताया कि अरुणा का पति अपाहिज है। उधर प्रफुल्ल भी तो इतने बड़े बंगले में एकाकी जीवन व्यतीत कर रहे हैं। दो युवा प्राणी क्या ख़ुद को संयमित कर पाते होंगे? मन में शंकाओं के जाल फैलने लगे थे। अपनी कल्पना में वो, कभी अरुणा और प्रफुल्ल को अलिंगंबद्ध देखती तो कभी उसे कविन और प्रफुल्ल के बीच बैठे हुए देखती।

उसके पिता ने भी तो यही किया था। मृत्युशैय्या पर लेटी उसकी मां की सेवा करने वाली नर्स से विवाह करके अपनी वफ़ादारी का ऐसा सबूत दिया था कि शारीरिक रूप से लाचार मां,मानसिक रोगिणी भी बन गयी थीं।“ लेकिन मैं न अंकुर की शबाना हूं, न ही मां की सेवासुश्रूषा में जुटी नर्स ही हूं।” उसने मन ही मन में संकल्प लिया कि जैसे भी हो वो, अरुणा को निकाल कर ही दम लेगी।

उस दिन रविवार था। सभी बाहर आंगन में धूप सेंक रहे थे। अरुणा कपड़े धो रही थी। कविन, बाल्टी में से पानी निकाल कर अरुणा पर उलीच रहा था और खिलखिला भी रहा था। प्रफुल्ल, चुपचाप बैठे इस दृश्य का आनंद लेते हुए बोले, “कुछ ही दिनों में अरुणा ने कविन को अपने बस में कर लिया है”

“हां बच्चों के साथ बड़ों को भी अपने वश में करने की अद्भुत क्षमता है इसमें”

प्रफुल्ल, तल्ख़ी भरे स्वर में छिपे पत्नी के व्यंग को भली प्रकार समझ गए थे। क्रोधावेश में उसने रस्सी पर फैलाती हुई प्रफुल्ल की क़मीज़, अरुणा के हाथों से छीन कर हैंगर पर टांग दिया। “क्या बिगाड़ा है इस ग़रीब ने तुम्हारा? क्यों अपमानित करने पर तुली हो उसे“

“अब मैं यहां आ गयी हूं तो,अरुणा की क्या ज़रूरत है”

“ गरीब लाचार औरत है, आदमी हैंडिकैप… कुछ कमाता नहीं है। तीन तीन बच्चे हैं। जो भी निर्णय लो, सोच समझ कर ही लेना”

“ दुनिया भर के गरीबों का जिम्मा हमने तो नहीं ले रखा है न” बुदबुदाती हुई, पैर पटकती सुरभि घर के अंदर चली गयी।

अरुणा की स्वामिभक्ति को सुरभि ने दैहिक संबंधों पर लाकर पटक दिया था। संदेह के बीज ने जैसे उसके सोचने समझने की शक्ति को ही समाप्त कर दिया था। यहां तक कि एक दिन उसने चोरी का इल्ज़ाम लगाकर उसे जेल के कठघरे तक पहुंच दिया। झूठे अहम् और संदेह के पलीते से भरा ये ऐसा विस्फोट था, जिस ने पति पत्नी के भावनात्मक संबंधों को ही हिला कर रख दिया था।

प्रफुल्ल, अरुणा की जमानत तो करवा आये लेकिन उस दिन के बाद उन्होंने उसे काम पर नहीं रखा। उसके बाद वो अक्सर टूर पर चले जाते, घर पर रहते तो बहुत कम बोलते। अक्सर किताबों की दुनिया में खोये रहते।

एक रात प्रफुल्ल टूर पर गए थे। सुरभि और कविन घर पर अकेले थे। अचानक फ्रिज में शॉर्ट सर्किट हुआ और पास ही रखी लकड़ी की अलमारी सुलगने लगी। जब तक सुरभि कुछ समझ पाती,आग की लपटें अपना विकराल रूप ले चुकी थीं। क्या करे क्या न करे? चीखती चिल्लाती भी तो उसकी चीखें सुनने वाला कौन था।

तभी उसने झोपड़ियों की और से कुछ लोगों को बंगले की तरफ़ आते हुए देखा। कलुषित मन ने फिर सोचा ये ज़रूर अरुणा के रिश्तेदार होंगे और प्रफुल्ल की अनुपस्थित में लूट खसोट करके सारा सामान ले जाएंगे। घबराहट के मारे सुरभि गश खाकर ज़मीन पर गिर पड़ी। उसके बाद क्या घटा, उसे नहीं मालूम। आंख खुली तो सुरभि अस्पताल में बिस्तर पर पड़ी थी। पास ही बिस्तर पर कविन लेटा था। बग़ल में प्रफुल्ल खड़े थे। सामने अरुणा सपरिवार खड़ी थी। उसके दोनों हाथों पर पट्टियां बंधी थीं। पूरा चेहरा जगह जगह से झुलस गया था।

“कैसी हैं बीबीजी” अरुणा ने पूछा तो सुरभि ने प्रतिप्रश्न

“तुम्हारे हाथों को क्या हुआ”

इस बार उत्तर डॉक्टर ने दिया था।

“आपको और आपके बच्चे को बचाने के प्रयास में इसके दोनों हाथ बुरी तरह झुलस गये हैं। समय पर अगर ये आपको न बचाती तो आपका बचना मुश्किल था”

पश्चाताप के आंसुओं की अविरल धारा अपनी सारी सीमाएं तोड़ कर सुरभि की आंखों से बह निकली। हाथ स्वतः जुड़ गये।

“तुम्हारे ऊपर मैंने इतने आरोप लगाए फिर भी तुमने मेरी और मेरे बेटे की रक्षा की? तुम सच में महान हो अरुणा”

“ महान तो बाबूजी हैं बीबीजी। इन्होंने मेरे बच्चों की भूख मिटाई, मेरे अपाहिज पति के इलाज के लिए ठेकेदार से पैसा दिलाया, और सबसे बड़ा उपकार तो इन्होंने मेरी इज़्ज़त बचाकर किया वरना शराब के नशे में धुत्त ठेकेदार तो मेरी आबरू लूट कर बच निकलता। मैं तो अपना पिता,भाई सब कुछ इन्हें ही मानती हूं”

सुरभि की नज़र में अरुणा बहुत ऊपर उठ गयी थी। अरुणा की बात ने उसे इस धारणा से मुक्त कर दिया था कि, औरत और मर्द के बीच, रिश्ता शरीर तक ही सीमित नहीं होता। भावनाओं और संवेदनाओं का भी अपना स्थान है।

-पुष्पा भाटिया

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